Friday, March 15, 2013

अभौतिक ऊर्जा ‘आत्मा’ का पुनर्जन्म एवं आनुवंशिकता तन्त्र
(ब्रह्माकुमारी अध्यात्म-दर्शन के विशेष सन्दर्भ में)


अभौतिक ऊर्जा ‘आत्मा’ की शाश्वतता अथवा अमरता भारतीय धर्म-दर्शन में प्रायतः सर्वस्वीकृत है । परन्तु अविनाशी आत्मा किस आधार से मनुष्य-देह को प्राप्त कर जन्म-मृत्यु के चक्र में संचरण करती है? इस ज्ञातव्य विषय पर ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक संस्थान द्वारा उद्घाटित कुछ अनुभवयुक्त व तर्कसंगत मन्तव्यों का निदर्शन प्राप्त होता है जिसमें आधुनिक जीवविज्ञान सम्बन्धी मुख्य तथ्यों का संयोजन किया गया है । फलस्वरूपतः सूक्ष्म रीति से विषयवस्तु के ऊपर प्रकाश डाल कर उसकी महत्वपूर्ण प्रासंगिकता को निर्देशित करने का एक समुचित प्रयास किया गया है । प्रस्तुत लेख ब्रह्माकुमारीज़ की दृष्टि में आध्यात्मिक शक्ति आत्मा के पुनर्जन्म तथा आनुवंशिकता सिद्धान्त सम्बन्धी विमर्शों का एक विशेष अनुशीलन है ।

ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक विज्ञान प्रतिपादन करता है कि ज्योतिर्विन्दुस्वरूप निराकारी ‘आत्मा’ मूलतः अपने मूल विश्राम गृह परमधाम वा ब्रह्मलोक में निवास करती है । किन्तु जब वह अपनी भूमिका का निर्वहन करने के लिए इस विश्व-नाटक मंच या सृष्टि पर अवतरित होती है, तब ‘जीवात्मा’ नाम से अभिहित होती है । यद्यपि अशरीरी आत्मा निराकारी, शाश्वत, अविनाशी व अजन्मा है, किन्तु देह-धारण करने से उसका जन्म के रूप में सूचित किया जाता है । किसी आत्मा को किसी विशेष परिवार में, विशिष्ट सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक वातावरण में कोई विशेष शरीर उसके कर्मों तथा संस्कारों के आधार पर प्राप्त होता है । जीवात्मा (अथवा मनुष्य) नये प्रयास द्वारा नये लक्षण प्राप्त कर सकती है तथा पुराने संस्कारों का परिवर्तन भी कर सकती है ।

जीव-विज्ञानी मानव देह के जन्म की व्याख्या पुरुष तथा स्त्री की जनन-कोशिकाओं (Germ cells) के समेल और आनुवंशिकता के आधार पर करते हैं । किन्तु विचारपूर्वक निर्णय करने पर अवज्ञात होता है कि ये नियम तथा आनुवंशिक कूटों का ज्ञान उक्त तथ्य को स्पष्ट करने के लिए अपर्याप्त है क्योंकि लाखों संभव मिलनों में से कोई विशेष समेल ही फलदायक क्यों होता है? जिसके उत्तर में ब्रह्माकुमारी संस्थान के मुख्य प्रवक्ता ब्र.कु. जगदीश चन्द्र स्वकीय मत व्यक्त करते हुए कथन करते हैं- मनुष्य के जन्म की व्याख्या कर्मों के नियमों तथा आत्मा के अस्तित्व के नियम के अनुसार एवं पुनर्जन्म के आधार पर अधिक अच्छी रीति से की जा सकती है ।

प्रत्येक शिशु एक विशिष्ट मनोवैज्ञानिक गठन के साथ जन्म लेता है जो दूसरे शिशु से भिन्न होता है । आधुनिक जीव-विज्ञानी के मतानुसार व्यक्तिओं के बीच शारीरिक गठन और मानसिक योग्यताओं में अन्तर दो कारकों से संघटित होता है, 1.‘आनुवंशिकता' तथा 2.‘पर्यावरण’ । उनके अनुसंधान के कार्य से निष्कर्ष रूप में यह बात प्रकटित होती है कि कुछ योग्यतायें तथा विशेषतायें प्रशिक्षण के जरिए या पर्यावरण से अर्जित की जा सकती हैं ।

किन्तु इस सन्दर्भ में ब्रह्माकुमार जगदीश चन्द्र ब्रह्माकुमारी दर्शन का मत उल्लेख करते हुए कहते हैं- यद्यपि व्यक्ति का कुल विकास उसकी जन्मजात संभाव्यताओं तथा पर्यावरणात्मक स्थितियों की परस्पर क्रिया का शुद्ध परिणाम हैं, तथापि उसका जन्मजात तथा सहज स्वभाव एवं उसकी अन्तर्निहित शक्तियाँ अभिभावी शक्तियाँ हैं । पर्यावरण निःसन्देह एक महत्वपूर्ण कारक है, किन्तु वह आधारभूत कारक नहीं है । पर्यावरणात्मक स्थितियाँ मनुष्य की वृद्धि की प्रक्रिया में केवल सहायक हो सकती हैं या बाधक हो सकती हैं । वर्तमान समय अधिकांश वैज्ञानिक इस विषय में सहमत हैं कि इन दो अवधारक कारकों में से आनुवंशिकता आधारभूत कारक है ।

इस विषय में जीव-विज्ञानी डॉ. ई.जी. कोंक्लीन (E.G. Conklin) क मत उल्लेखनीय है- “निःसन्देह, विकास के कारक या कारण केवल जनन-कोशिकाओं में ही नहीं पाये जाते, बल्कि पर्यावरण में भी पाये जाते हैं; न केवल भीतरी शक्तियों में बल्कि बाहरी शक्तियों में भी पाये जाते हैं । किन्तु यह बात भी उतनी ही निश्चित है कि विकास के निर्देशी कारक तथा मार्गदर्शी कारक मुख्यतः आन्तरिक होते हैं और जनन-कोशिकाओं के संगठन में उपस्थित होते हैं, जबकि पर्यावरणात्मक कारक विकास पर मुख्यतः एक उद्दीपक, अवरोधक या उपान्तरकारी प्रभाव डालते हैं ।”

निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा ब्र.कु. जगदीश पूर्वोक्त कथन का और अधिक स्पष्टीकरण प्रदान करते हुए अपने विचार प्रकट कर रहे हैं-

i. मनुष्य अपने वातावरण का चयन कर सकता है, किन्तु उसका सहज स्वभाव वही होता है जो पूर्व में विद्यमान है । इसके अतिरिक्त बहुधा मनुष्य अपने पर्यावरण का चयन अपनी सहज प्रवृत्तियों के अनुसार करता है ।

ii. यद्यपि मनुष्य अपनी पसन्द के अनुरूप अपने वातावरण का चयन न कर सके फिर भी वह उसमें बहुत परिवर्तन कर सकता है एवं पर्यावरणात्मक स्थितियों को उपान्तरित कर सकता है ।

iii. यदि मनुष्य पर्यावरण की कतिपय स्थितियों को उपान्तरित न कर सका तो वह उनसे अपनी रक्षा कर सकता है या उनका उपयोग अपने सर्वोत्तम लाभ के लिए कर सकता है ।

iv. मानव अपनी मानसिक तथा आध्यात्मिक क्षमताओं को इतना अधिक विकसित कर सकता है कि वह पर्यावरणात्मक स्थितियों से ऊपर उठ सकता है या उन्हें अपने अधीन कर सकता है । उदाहरणार्थ, कोई योगी अपने भीतर की मानसिक योग्यताओं तथा आध्यात्मिक प्रवृत्तियों को इस तरह विकसित करता है कि वे उसे पर्यावरणात्मक स्थितियों से अप्रभावित रहने में सहायता पहुँचाती है ।

अतः मानव के विकास का अवधारण करने वाले कारकों में से आनुवंशिकता एक आधारभूत कारक है । अधुना आधुनिक जीव-विज्ञान द्वारा प्रतिपादित आनुवंशिकता के जनन सिद्धान्त के आधार पर मानव अथवा जीवात्मा की पुनर्जन्म रूपी समस्या की व्याख्या आध्यात्मिक सिद्धान्त की अपेक्षा बेहतर ढंग से की जा सकती है? तत्सहित एक सर्वस्वीकरणीय तथ्य प्रदान किया जा सकता है? इस विषय पर ब्रह्माकुमारी अध्यात्म-विज्ञान के अभिमतों का तुलनात्मक विधि से विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है ।

 आनुवंशिकता का जनन-सिद्धान्त

आधुनिक जीव-विज्ञान के अनुसार, अन्य बहुकोशिकीय जीवित वस्तुओं की तरह मानव-शरीर असंख्य सूक्ष्म कोशिकाओं से गठित है तथा प्रत्येक कोशिका एक लघु जीव(Organism) है जिसे जीवन की एक मूलभूत इकाई समझा जाता है । नई कोशिकायें पुरानी विद्यमान कोशिकाओं के विभाजन से अस्तित्व में आती हैं एवं इसी प्रकार से नवजात शिशु बढ़कर किशोर और किशोर वृद्धि का पाकर वयस्क व्यक्ति बन जाता है । देह-कोशिकायें साधारण होती हैं जिनमें जनन की योग्यता होती है तथा वे जनन की क्रिया संपादित करती हैं । पुरुष के देह में स्थित जनन-कोशिका को ‘शुक्राणु’ (Sperm) एवं स्त्री के देह में विद्यमान जनन-कोशिका को ‘अण्डाणु’ (Ovum) कहा जाता है । दोनों कोशिकाओं का सामान्य नाम ‘युग्मक’ (Gamete) है । प्रत्येक जनन-कोशिका में अर्थात् युग्मक में धागे की आकृति वाली सत्तायें होती हैं जिसे ‘गुणसूत्र’ (Chromosomes) कहा जाता है । मानव प्रजाति की प्रत्येक जनन-कोशिका या युग्मक में गुणसूत्रों के 23 युगल होते हैं । इन गुणसूत्रों पर ‘जीन’ (Gene) कहलाने वाली उपादान इकाइयाँ (Material units) स्थित होती हैं । जीव-विज्ञानियों के मतानुसार इनमें से प्रत्येक जीन बालों तथा आँखों के रंग जैसी कतिपय विशेषतायें प्रेषित करने के लिए उत्तरदायी हैं जो शुक्राणु तथा अण्डाणु के मेल से जन्मे नये व्यक्ति को वंशागत रूप में प्राप्त होती हैं । पुनः जीव-विज्ञानी प्रतिपादित करते हैं कि रंग, आकृति, आकार आदि जैसे गुण या लक्षण जीनों या जन-कोशिकाओं में उपस्थित नहीं होते, बल्कि एक आयोजना जैसी कोई वस्तु उनमें ‘कूटबद्ध’ होती है जो नये, आने वाले व्यक्ति में उत्पन्न करने में सक्षम होती है । उसको ‘आनुवंशिक कूट’ (Genetic code) नाम से जाना जाता है ।

जीव-विज्ञानी व्याख्या करते हैं- जब कोई पुरुष तथा कोई स्त्री जनन के लिए शारीरिक रूप से एक हो जाते हैं तब पुरुष स्त्री में लाखों शुक्राणु निक्षेपित करता है । संयोगवश एक शुक्राणु एक अण्डाणु से मिलता है और शुक्राणु अण्डाणु से मिलकर एक नई कोशिका का निर्माण करता है जो ‘संसेचित अण्डा’ (Zygote) कहलाती है । यथा समय यह व्यक्ति के देह के रूप में विकसित होता है एवं इस प्रकार पुरुष की जनन-कोशिका तथा स्त्री की जनन-कोशिका के नाभिकों के मिलन से उत्पन्न संसेचित (Zygote) किसी व्यक्ति के जैव-भौतिक अस्तित्व का आरम्भ-बिन्दु होता है । यह एकल कोशिका सूक्ष्म होती है, किन्तु संभाव्य जैव-भौतिक इकाई होती है । वह अत्यन्त सूक्ष्म होती है, अतः माइक्रोस्कोप के माध्यम से ही उसको देखा जा सकता है तथा उसकी शक्ति अद्भुत होती है ।

शुक्राणु तथा अण्डाणु के मेल से निर्मित ‘संसेचित अंडे’ में पिता से आये 23 गुणसूत्र तथा माता से आये 23 गुणसूत्र अन्तर्विष्ट होते हैं । जीन जो माता-पिता दोनों की ही आनुवंशिक इकाइयाँ हैं, उनके भीतर स्थित होते हैं । वस्तुतः शिशु तथा उसके माता-पिता या पूर्वजों के बीच एकमात्र कड़ी यह आनुवंशिक सामग्री है । एडमण्ड सिनॉट (Edmund W. Sinnot) एवं अन्य जीव-विज्ञानी अपनी-अपनी पुस्तक में इसके बारे में उल्लिखित करते हैं- “जो एकमात्र भौतिक वस्तुयें कोई व्यक्ति अपने माता-पिता से वंशागत रूप में पाता है वे ‘जीन’ हैं, जो अण्डाणु तथा शुक्राणु कोशिकाओं में रहते हैं जिनसे इस देह की उत्पत्ति होती है ।” वस्तुतः अण्डाणु तथा शुक्राणु के नाभिक जनन पदार्थ के छोटे-छोटे पैकेट, जिनमें इतनाकुछ भरा हुआ होता है और जिनमें से इतना कुछ निर्गमित होता है- विद्यमान जीवित पदार्थ के अत्यन्त उल्लेखनीय खण्ड है । इसलिए आधुनिक जीव-विज्ञान के अनुसार माता-पिता के शारीरिक तथा मानसिक लक्षण जनन-आनुवंशिकता की प्रक्रिया के जरिए सन्तान को प्रेषित किये जाये हैं । किन्तु इससे पूर्णतया निष्कर्ष प्राप्त नहीं होता है ।

अतः अध्यात्मवादी ब्र.कु. जगदीश चन्द्र ब्रह्माकुमारीज़ का मत उल्लिखित करते हुए अभिधान करते हैं कि आध्यात्मिक दर्शन मानव-जनन की प्रक्रिया की जीव-विज्ञानीय व्याख्या का वहाँ तक खंडन नहीं करता जहाँ तक कि संतान के स्थूल भौतिक देह का सम्बन्ध है । किन्तु अध्यात्म का मुख्य तर्क यह है कि आनुवंशिकता का सिद्धान्त किन्हीं भी दो व्यक्तियों की प्रवृत्तियों आदि में पाई जाने वाली भिन्नताओं की व्याख्या नहीं करता । यदि कोई व्यक्ति केवल या मुख्यतः एक देह होता तब जनन-कोशिकाओं के जरिए माता-पिता के भौतिक कणों का अन्तरण उसकी उत्पत्ति की कोई सन्तोषजनक व्याख्या दे सकता था । किन्तु देह से अधिक महत्वपूर्ण है व्यक्ति का ‘मन’ या ‘स्व’ या ‘आत्मा’ । पुनः ‘मन’ या ‘स्व’ कोई वंशागत भौतिक संपत्ति नहीं है अपितु उसका स्वयं का अपना अस्तित्व है ।

आनुवंशिकता के जैविकीय नियमानुसार “जैसे माता-पिता हैं वैसे ही शिशु होंगें” । किन्तु “साधारण बुद्धि वाले माता-पिता किसी विलक्षण प्रतिभाशाली शिशु को जन्म देना” आदि घटना का आनुवंशिकता के सिद्धान्त के आधार पर कोई भी जीव-विज्ञानी वैज्ञानिक दृष्टि से तथा समाधान कारक रूप में समुचित विश्लेषण नहीं कर सकता । जीव-विज्ञानी ज्यूलियन हक्सले (Julian Huxley) तथा वैज्ञानिक दोब्जान्स्की (Dobzhansky) आदि अपने-अपने मत प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि साधारण बुद्धि वाले माता-पिता के शिशु का प्रतिभाशाली होना एक संयोग है । अन्यपक्षतः वैज्ञानिक मत व्यक्त करते हैं कि इसका नियन्त्रण ‘कारण और कार्य’ के नियम अनुसार होता है ।

ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक विज्ञान इस सन्दर्भ में प्रतिपादन करता है कि कारण-कार्य का नियम मानवीय स्तर पर एक नैतिक नियम के रूप में लागू होता है जो ‘कर्म सिद्धान्त’ कहलाता है । पुनर्जन्म का सिद्धान्त जो किसी व्यक्ति के पुनर्जन्म का विनियमन करता है, कर्म के सिद्धान्त पर आधारित है । पुनश्च प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ अपने मन को लाता है तथा आनुवंशिकता का सिद्धान्त केवल किसी व्यक्ति के जैव-भौतिक गठन पर ही लागू होता है । ब्र.कु. आध्यात्मिक दर्शन यह बताता है कि किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति की असाधारण योग्यतायें युग्मक (Gametes) के सांयोगिक मिलन के कारण और आनुवंशिकता के कारण नहीं होती, बल्कि ‘स्व’ या ‘आत्मा’ के पूर्वतर जन्मों में अर्जित तथा संवर्धित की गई होती हैं । ब्रह्माकुमार जगदीश अनेक तर्कयुक्त तथ्य प्रस्तुत कर आध्यात्मिक विज्ञान के मत को पोषित करते हुए अभिलिखित करते हैं- ‘स्व’ या ‘मन’ या ‘आत्मा’ जो अभिवृत्तियों, रुचियों तथा मानसिक योग्यताओं का आधान या वाहन है, जैव-भौतिक रासायनिक सत्ता से भिन्न है और वह वह गैमीटों या अण्डाणु और शुक्राणु के मिलन से पहले भी अस्तित्व में रहा है और इसलिए वह माता-पिता से वंशागत रूप में प्राप्त नहीं होता ।

अतः मानसिक लक्षण जो एक व्यक्ति और किसी अन्य व्यक्ति के बीच में आधारभूत अन्तर के कारण होते हैं, माता-पिता से प्राप्त नहीं होते । इसी कारण से शिशुओं के मानसिक लक्षण उनके माता-पिता के लक्षणों से भिन्न होते हैं । यहाँ तक कि जुड़वाँ शिशु भी, जहाँ तक उनके मानसिक लक्षणों का सम्बन्ध है, एक-दूसरे से और माता-पिता से भिन्न होते हैं । इसका कारण यह है कि पुनर्जन्म के अनुसार यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति की भौतिक विशेषतायें आनुवंशिक होती हैं, तथापि वह अपना स्वयं का मन अपने साथ लाता है । पुनश्च भौतिक विशेषतायें भी पूर्णतः माता-पिता से व्युत्पन्न नहीं होतीं । वस्तुतः उनके मूल उनके पूर्वजन्मों में खोजे जा सकते हैं । लाखों शुक्राणुओं में से कौन-सा शुक्राणु अण्डाणु को संसेचित करेगा- यह बात इस कारक पर निर्भर होती है । कौन-से जीन अन्ततः एकत्रित होकर निर्माण कारकों के रूप में कार्य करेंगे - यह बात व्यक्ति के पूर्व कर्मों पर निर्भर होती है । इसलिए मानव-प्राणी का जन्म शुक्राणुओं तथा अण्डाणुओं के रूप में भौतिक संघटकों के सांयोगिक मिलन से होता है, कहना सर्वथा असिद्ध है ।

एतद्व्यतिरिक्त, किन भौतिक लक्षणों को वह अपने माता-पिता से प्राप्त करता है, वे उन असंख्य संभावनाओं में से होते हैं जो उसके कर्म के परिणामस्वरूप उसे प्राप्त होती हैं । अतः अन्तर्विवेकशील सत्ता अर्थात् ‘आत्मा’ को अन्तर्भुक्त किये बिना व्यक्तिगत भिन्नता की व्याख्या नहीं की जा सकती । निश्चिततया भौतिक विकास की एक आयोजना भ्रूण में अन्तर्निहित होती है, किन्तु इस विशिष्ट संदर्भ में कौन-सी आयोजना निष्पादित की जाती है यह बात उस व्यक्ति (आत्मा) के पूर्व कर्म पर निर्भर करती है जिसके लिए देह अभिप्रेत है । उसका अस्तित्व देह के अस्तित्व से पूर्ववर्ती होता है । इसलिए अन्तर्विवेकशील सत्ता के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति स्वतः यह जानता है कि वह विद्यमान है अर्थात् वह अपने अस्तित्व के प्रति अभिज्ञ होता है । उसका अस्तित्व स्वतः स्पष्ट है क्योंकि यही ‘आत्मा’ सत्ता देह के अस्तित्व को भी जानती है ।

इसलिए ब्रह्माकुमारी दर्शन के अनुसार जब आत्मा अपने मूल निवास स्थान ‘ब्रह्मलोक’ से इस भौतिक जगत् पर अवतरित होकर शरीर के माध्यम से कर्म करती है, तब जीवात्मा बनकर कर्मानुरूप सुख-दुःखात्मक फल का उपभोग करती है । अर्थात् सृष्टि की प्रारम्भिक अवस्था में सत्त्वगुणसंपन्न आत्मा संपूर्ण सुख-शान्ति का अनुभव करती है, किन्तु जब वह पंचभूतात्मक शरीर (प्रकृति/पदार्थ) के साथ तादात्म्य स्थापित कर आत्म-अभिमानी स्थिति से विच्युत होकर देह-अभिमानी बन जाती है तब उसके सत्त्वगुणी संस्कार क्षयीभूत होकर क्रमशः रजोगुणी तथा तमोगुणी संस्कार प्रादुर्भूत हो जाते हैं । जीवात्मा सर्वाधिक 84 जन्म ही ग्रहण कर सकती है एवं मनुष्य की आत्मा सर्वदा मनुष्य के रूप में ही जन्म लेती है, न कि अन्य पशु-पक्षी आदि अन्य निकृष्ट योनियों के रूप में । मनुष्य अपने द्वारा किये गये सत्कर्म या विकर्म के परिणाम-स्वरूप मनुष्य जन्म में ही शारीरिक स्थिति व परिवार प्राप्त करता है तथा सुख-दुःख का अनुभव भी करता है । इसलिए आत्मा कदापि निर्लिप्त नहीं रहती है । आत्मा ही विषयी या अनुभवकर्ता है जो शरीर-रूपी विषय, उपकरण या साधन के जरिए भौतिक वस्तुओं का उपभोग करती है ।

इस प्रकार वैज्ञानिक तथ्य तथा व्यावहारिकता को सम्मिलित करते हुए एक नवीन दृष्टिकोण के साथ ब्रह्माकुमारी अध्यात्म दर्शन अपना आध्यात्मिक मन्तव्य व्यक्त करते हुए सयुक्तिक यह पुष्ट करने का प्रयत्न करता है कि मनुष्य जो संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, अपने जन्म की वास्तविक संरचना के रूप का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने से ही तदनुसार संसार रूपी कर्मक्षेत्र में स्वकीय समुचित योगदान प्रस्तुत कर सकता है । ब्रह्माकुमारी दर्शन का यह एक अमूल्य सिद्धान्त है कि सम्यक् अवबोध व व्यवहार से ही श्रेष्ठ स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है । अतः मानवता को उच्च स्तर तक पहुँचाना इस अध्यात्म विज्ञान का मुख्य उद्देश्य है ।

सन्दर्भग्रन्थसूची

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