Saturday, December 10, 2011

सृष्टि-संरचना : एक अनुशीलन
(भारतीय दर्शन, विज्ञान एवं ब्रह्माकुमारी दर्शन के सन्दर्भ में)

जीवन तथा सृष्टि-सम्बन्धित रहस्यों को उद्घाटित करने हेतु जिज्ञासु एवं प्रवृत्तिशील मनुष्यों के मानस में चिन्तनधारा प्रवाहित होती आ रही है । जबसे मानव ने अपने अस्तित्व एवं दृश्यमान बाह्य जगत् को जानने का प्रयास किया, तबसे उसकी बौद्धिक-चिन्तनशैली दार्शनिक व आध्यात्मिक दिशा को प्राप्त होती रही है । वैदिक काल से प्रारम्भ कर अद्यावधि अनेक दार्शनिक, वैज्ञानिक, विद्वान्, मनीषी स्व-बुद्धि-शक्ति का सम्यक् उपयोग कर सृष्टि-विषयक गंभीर तथ्यों के ऊपर मत प्रस्तुत करते आये हैं ।

क्रान्तदर्शी वैदिक ऋषियों ने मानस-चक्षु से साधना की श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहकर जिस सत्य का प्रत्यक्ष किया था, उसी के आधार पर समग्र वैदिक वाङ्मय का सृजन हुआ है । उस ज्ञान की अनुपम निधि वेद के हिरण्यगर्भ, नासदीय, पुरुष आदि कतिपय दार्शनिक सूक्तों में सृष्ट्युत्पत्ति-पूर्व की अवस्था तथा सृष्टि-सर्जना विषयक तथ्य मनोरम रूप में प्रतिफलित हुए हैं ।

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । (ऋ. 10.121.1)
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् । (ऋ. 10.129.1)

तस्माद् विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ (ऋ. 10.90.5)


पुनश्च ऋग्वैदिक त्रिमन्त्रात्मक अतिक्षुद्र सूक्त भाववृत्त भी सृष्टि-विषयक गहन तथ्य को उपस्थापित करता है ।
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽभ्यजायत ।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥ (ऋ. 10.190.1)


इसी प्रकार वैदिक वाङ्मय अर्थात् संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद् में सृष्टि-विज्ञान सम्बन्धित तथ्यों का विविध रूप से वर्णन किया गया है । उपनिषद् जो कि अध्यात्म व दार्शनिक क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, में जगत्, आत्मा, ईश्वर आदि सृष्टि के अङ्गभूत तत्त्वों के ऊपर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है । विद्वज्जनों के आख्यानानुसार समग्र उपनिषद्-रूप ज्ञानराशि के सारभूत शास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता में सम्पूर्ण अध्यात्म-तत्त्वों के विषय सन्निविष्ट हैं । तत्त्वदर्शियों के मत में संसार में किसी भी वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती, अपितु रूपान्तरमात्र ही संघटित होता है । गीता में यह तथ्य उल्लिखित है-
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । (गीता. 2.16)

अर्थात् असत् वस्तु की सत्ता नहीं है तथा सत् वस्तु का अभाव भी नहीं है । पुनः सृष्टि को एक अविनाशी वृक्ष के रूप में उपमित कर वर्णन किया गया है-
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ (गीता. 15.1)


फिर विश्व-ब्रह्माण्ड इत्यादि जागतिक तत्त्वों का समुद्भव कैसे हुआ? यह रहस्यात्मक विषय ज्ञातव्य है । इसी क्रम में पुराणों में भी सृष्टि-प्रक्रिया का सुस्पष्ट निदर्शन प्राप्त होता है ।

वैदिक सृष्टि-विज्ञान संबंधित गुह्य तथ्यों पर विश्लेषण करने हेतु तथा तार्किक शैली में उपस्थापित करने के उद्देश्य से विविध दार्शनिक शाखाओं का समुन्मेष हुआ है । प्रमुखतया वेदान्त, सांख्य, न्याय एवं बौद्ध - चारों भारतीय दर्शनों ने सृष्टि-तत्त्व के सन्दर्भ में एक-एक अभिनव पथ को प्रदर्शित किया है जो कि सत्कारणवाद, सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद एवं असत्कारणवाद नाम से विदित है । इन चारों दार्शनिक शाखाओं द्वारा स्थापित उक्त सृष्टि-सर्जनात्मक तथ्यों को क्रमशः एक-कारणतावाद, द्वि-कारणतावाद, अनेक-कारणतावाद व शून्य-कारणतावाद के नाम से अभिहित किया जा सकता है तथा उपर्युक्त कारणतावाद-चतुष्टय के अन्तर्गत ही अवशिष्ट समस्त दार्शनिक शाखाओं का समावेश हो जाता है ।

एक-कारणतावाद, जो कि अद्वैत-वेदान्त दर्शन द्वारा प्रतिष्ठापित है, में एकमात्र कारण ब्रह्म है, जिससे ही कृत्स्न जगत् की अभिव्यक्ति हुई है । महर्षि बादरायण-प्रणीत ब्रह्मसूत्र के ‘जन्माद्यस्य यतः’ (ब्र.सू. 1.1.2) सूत्र पर रचित शाङ्करभाष्य में इसका विशद विवेचन किया गया है । शैव दर्शन भी इस एक-कारणतावाद के सपक्ष में है, जिसमें एकमात्र परमसत्ता शिव से सकल जगत् की रचना का विषय वर्णित है । सांख्यदर्शन प्रतिपादित द्वि-कारणतावाद के अनुसार चैतन्य पुरुष और जड़ प्रकृति के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति होती है । ईश्वरकृष्ण-कृत सांख्यकारिका में इसका दृष्टान्त उपलब्ध है-
पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य ।
पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत् कृतः सर्गः ॥ (सां.का, 21)


न्याय-वैशेषिक-दर्शन-प्रधान अनेक-कारणतावाद के अनुसार समग्र जगत् सामूहिक कार्यरूप है । इस जगत् में स्थित प्रत्येक कार्यरूप पदार्थ के पृथक् पृथक् कारण हैं, वे मूलतया परमाणुरूप हैं एवं एक परमाणु का अन्य परमाणु के साथ संयोग निमित्त कारण ईश्वर के द्वारा संपन्न होता है । जैनदर्शन में जीव, अजीव आदि अनेक तत्त्वों का वर्णन कर अनेक-कारणतावाद सिद्धान्त को प्रकट किया गया है । मीमांसादर्शन एवं चार्वाकदर्शन भी इस वाद का समर्थन करते हैं । शून्य-कारणतावाद सिद्धान्त के पक्षधर बौद्धदर्शन में शून्य-रूपात्मक जगत् की अभिव्यक्ति का स्पष्टतः उल्लेख प्राप्त होता है ।

इसी प्रकार प्रत्येक दार्शनिक शाखा के मूर्धन्य विद्वानों ने उक्त सृष्टि-संबंधी विषय को प्रस्तुत करने के लिए यथातथ्य तर्कादि द्वारा स्व-स्व सैद्धान्तिक मतों को पुष्ट किया है । प्राचीन दार्शनिकों ने अपनी उच्चतर मनःस्थिति के माध्यम से प्रसंग को उपस्थापित करने हेतु तर्क व प्रमाणादि का चयन किया है तथा फलस्वरूपतः स्वकीय दार्शनिक शाखा को एक उच्च स्तर पर अवस्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया है ।

सृष्टि व तत्संबंधित रहस्यों का ज्ञान प्राप्त करने हेतु जो प्रयास किया गया है उसमें एक दार्शनिक शाखा के सिद्धान्त में जो न्यूनता परिलक्षित हुई है, उसको पूर्वपक्ष के रूप में सादर स्थान प्रदान कर, परिहार करने के लक्ष्य से उत्तरपक्ष के रूप में अन्य दार्शनिक शाखा, अपने सिद्धान्त को प्रामाणिक रीति से सयुक्तिक भिन्न-भिन्न तथ्यों का समावेश कर प्रतिष्ठापित करती है । अतः चार्वाक दर्शन से आरम्भ कर अद्वैत-वेदान्त दर्शन पर्यन्त दार्शनिक परम्परा की स्थिति उपस्थित हुई अथवा भौतिकता की पृष्ठभूमि से लेकर पारमार्थिक अवस्था तक पहुँचने की क्रमिक गति आकलित की गई है ।

वर्तमान समय में विज्ञान की सर्वांगीण प्रतिष्ठा है, क्योंकि विज्ञान किसी भी वस्तु के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए समुचित साधनों का उपयोग कर अनुभूत सिद्धान्तों को सर्वसमक्ष उपस्थित कर देता है । अतः विज्ञान के निष्कर्ष निश्चित तथा पूर्णतया स्पष्ट स्वीकार किये जाते हैं । विज्ञान मुख्यतः जड़ प्रकृति में संघटित क्रिया-प्रतिक्रिया को विधिपूर्वक जानने, परीक्षण करने तथा प्रयोग करने के ऊपर ध्यान देता है । सृष्टि-संरचना के क्षेत्र में विज्ञान के दो प्रमुख आयामों का अवलोकन किया जाता है । प्रथमतः शास्त्रीय भौतिकी (Classical Physics) जिसमें प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन के द्वारा प्रदत्त सिद्धान्त उल्लेखनीय है एवं द्वितीयतः आधुनिक भौतिकी (Modern Physics) जिसमें प्रख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टाइन का सामान्य और विशेष सापेक्षता का सिद्धान्त (General & Special Theory of Relativity), जेम्स क्लॉर्क मैक्सवेल का तापगतिकी सिद्धान्त (Theory of Thermo-dynamics), मैक्स प्लैंक का क्वाण्टम सिद्धान्त (Quantum Theory) तथा हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त (Principle of Uncertainty or Indeterminism) सर्वप्रमुख व प्रायः सर्वस्वीकृत हैं ।

न्यूटन के द्वारा प्रतिष्ठापित सिद्धान्त, पाश्चात्य दार्शनिक व गणितज्ञ रेने डेकार्त के मत पर अवलम्बित है, जिसमें मन (Mind) एवं द्रव्य (Matter) - दो मुख्य तत्त्वों के ऊपर विमर्श किया गया है । न्यूटन के सिद्धान्तानुसार विश्व की अवस्थिति, त्रि-आयामीय अवकाश (Space) पर है, जिसमें समस्त भौतिक घटना संघटित होती है । यह अवकाश सदा निरपेक्ष एवं अपरिवर्तनशील है । पुनश्च भौतिक जगत् में होने वाले परिवर्तन को वर्णित करने का आधार समय भी निरपेक्ष है तथा वह जगत् से पूर्णतः असंबद्ध व निरन्तर प्रवहमान है । जगत् के समस्त तत्त्व, भौतिक कण जो कि नितान्त सूक्ष्म, ठोस तथा परिवर्तन-रहित हैं, इन दोनों निरपेक्ष अवकाश-समय (Space-time) के अन्तर्गत ही गतिशील होते हैं । न्यूटन की दृष्टि में, सृष्टि के प्रारम्भ में ईश्वर ने भौतिक कणों का निर्माण, उनमें बल तथा गतिमान होने की क्षमता उत्पन्न की । इसी प्रकार समग्र विश्व गतिशीलता को प्राप्त हुआ एवं अपरिवर्तनीय नियमों के द्वारा एक यन्त्र की भाँति चल रहा है ।

परन्तु 20वीं शताब्दी में विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने जब सापेक्षता के सिद्धान्त (Theory of Relativity) और मैक्स प्लैंक ने क्वाण्टम सिद्धान्त (Quantum Theory) को स्थापित किया, तब न्यूटन का जगत्-सम्बन्धी दृष्टिकोण परिवर्तित हो गया तथा आधुनिक भौतिक-विज्ञान (Modern Physics) का शुभारम्भ हुआ । प्रथमतः अल्बर्ट आइन्स्टाइन के ‘सापेक्षता का सिद्धान्त’ के अनुसार अवकाश (Space) त्रि-आयामी नहीं है और न ही समय (Time) की कोई पृथक् स्थिति है । दोनों का पारस्परिक अन्तःसंबंध होकर एक चतुः आयामीय सातत्यक (Four-dimensional continuum) का गठन होता है । अतः अवकाश की स्थिति समय के बिना अथवा समय का कथन अवकाश के बिना संभव नहीं । दोनों की सापेक्षता, न्यूटन के निरपेक्ष अवकाश-समय (Absolute space-time) मत को निरस्त कर देती है ।

पुनश्च न्यूटन द्वारा प्रतिपादित भौतिक तत्त्व वा कण सम्बन्धित मन्तव्य का भी निरसन हो जाता है । यह भौतिक तत्त्व ठोस नहीं है, अपितु ऊर्जारूप है । तापगतिकी के प्रथम नियमानुसार ऊर्जा की न ही उत्पत्ति और न ही विलय होता है, केवल रूपान्तरण-मात्र घटित होता है ।

द्वितीयतः क्वाण्टम सिद्धान्त के अनुसार भौतिक जगत्, परमाणुओं का संघातरूप है और वह परमाणु भी इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन उप-परमाणुओं का समाहार है । अर्थात् भौतिक जगत् में निरन्तरता नहीं है, परन्तु सूक्ष्म विच्छिन्न भौतिक ऊर्जा कणों का समूह ही विद्यमान है । प्रकाश की धारा भी अविच्छिन्न नहीं है, किन्तु उसमें भी पृथक् पृथक् सूक्ष्म प्रकाश कण समाविष्ट हैं । यह प्रकाश, कण तथा तरंग उभय रूप में प्रतीत होता है । आइन्स्टाइन ने क्वाण्टम सिद्धान्त को आधार बनाकर मत प्रस्तुत किया है कि सभी प्रकार के विकिरण-रूप ऊर्जा, प्रकाश, ताप, क्ष-किरण (x-ray) आदि वास्तवतः अवकाश के माध्यम से पृथक् वा विच्छिन्न रूप से गतिशील होते हैं । प्रकाश कणों को ही फोटॉन (Photon) नाम से नामित किया गया है ।

तृतीयतः जर्मन भौतिकीविद् हाइजेनबर्ग द्वारा प्रतिपादित अनिश्चितता का सिद्धान्त (Principle of Uncertainty) के फलस्वरूप न्यूटन एवं डाल्टन के परमाणु विषयक सिद्धान्त खण्डित हो जाते हैं तथा पारमाणविक जगत् में एक नवीन दृष्टिकोण प्राप्त होता है । किन्तु आइन्स्टाइन ने इस सिद्धान्त को अस्वीकार किया है । अनिश्चितता सिद्धान्त के अनुसार- विज्ञान को अबतक ज्ञात किसी भी सिद्धान्त के सहारे किसी इलेक्ट्रॉन की स्थिति और उसके वेग को निश्चित करने और उसी के साथ विश्वास-पूर्वक यह कहना कि कोई इलेक्ट्रॉन ‘ठीक यहाँ’ है और ‘इतनी-इतनी गति से’ गतिशील है, असंभव है क्योंकि उसकी स्थिति का प्रेक्षण करने के कार्य से ही उसका वेग बदल जाता है और विलोमतः, मनुष्य उसके वेग को निश्चित करने की कोशिश जितनी ही अधिक करता है उतनी ही अधिक अनिश्चित उसकी स्थिति हो जाती है । पुनश्च इस सिद्धान्त का अन्य तात्पर्य यह है कि कारण-कार्य सम्बन्ध का प्रयोग क्वाण्टम या उप-पारमाणविक जगत् के क्षेत्र में नहीं हो सकता ।

चतुर्थतः मैक्सवेल प्रतिपादित तापगतिकी (Thermo-dynamics) के द्वितीय नियम के अनुसार विश्व में भौतिक तत्त्व वा प्रकृति, जो कि चिरस्थायी है, निरन्तर परिवर्तित हो रही है और वह परिवर्तन, विच्छेदन की ओर सूचित कर रहा है । प्रकृति की समस्त संघटना, जो कि अणु तथा बाह्य अवकाश में घटित हो रहा है, सूचित कर रही है कि द्रव्य और विश्व की ऊर्जा अनवरत रूप से विकीर्ण हो रही है अर्थात् उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा में हानि हो रही है, जिसे एन्ट्रॉपी (Entropy) नाम से अभिहित किया गया है । इसी दृष्टि से विश्व में स्थित ऊर्जा अन्ततः शून्यता को प्राप्त करने की संभावना हो रही है । अतः विश्व उष्मा-मृत्यु (Heat-death) की ओर अग्रसर हो रहा है, जिसको अत्यधिक एन्ट्रॉपी (Maximum Entropy) की अवस्था द्वारा परिभाषित किया गया है । फलतः प्रकृति की समग्र प्रक्रियाएँ अवरुद्ध हो जायेंगी ।

पञ्चमतः सृष्ट्युत्पत्ति के विषय में विज्ञान के अत्यन्त लोकप्रिय तथा प्रचलित सिद्धान्त बिगबैंग सिद्धान्त (Bigbang Theory) महत्त्वपूर्ण है, जो कि 1927 में खगोलशास्त्री जर्ज एडवर्ड लिमाइत्रे द्वारा प्रथम प्रस्तावित किया गया एवं खगोल-भौतिकीविद् जर्ज गेमो के समर्थन और प्रचार-प्रसार से एक सिद्धान्त का रूप धारण किया । इस सिद्धान्त के अनुसार दूरस्थ अतीत के शून्य समय (Zero time) में ब्रह्माण्ड (विशाल द्रव्यमान) का प्रचण्ड विस्फोट हुआ । उस महाविस्फोट के अंश जो कि सभी दिशाओं में प्रचंडता से प्रक्षिप्त हुए, आकाशगंगायें बन गये । न केवल ब्रह्माण्ड के अंशों से आज की आकाशगंगायें बनीं, अपितु एक सूक्ष्म स्तर पर ब्रह्माण्ड खण्डित हुआ एवं इस प्रकार विभिन्न परमाणु तथा ज्ञात 108 मूल तत्त्वों का भी निर्माण हो गया । इस बिगबैंग सिद्धान्त में दृष्ट न्यूतता को दूरीभूत करने के लिये बाद में तीन वैज्ञानिक हरमन बॉण्डी, थॉमास गोल्ड तथा फ़्रेड हॉयल ने सतत निर्माण सिद्धान्त (The Continuous Creation Theory) या स्थायी अवस्था सिद्धान्त (The Steady-state Theory) का विवेचन प्रस्तुत किया ।

षष्ठतः विकासवाद के जनक, चार्ल्स डार्विन ने जीवन के उद्गम के विषय में अपना मत प्रस्तुत किया, जो डार्विन सिद्धान्त (Darwin Theory) के नाम से प्रख्यात हुआ । इस सिद्धान्त के अनुसार जीव एक आद्य सूप (Premodial soup) से उत्पन्न हुआ । उसके पहले निर्जीव द्रव्य था और पृथिवी पर सरलतम रूप में था, जैसे कि एक कोशिका अमीबा के रूप में जीवन का अस्तित्व नहीं था । तबसे अनेक वैज्ञानिकों ने जीवित कोशिका, जीवित अणु, जीवित प्रोटीनॉएड या जीवित अणु सूक्ष्म गोलक का संश्लेषण करने के लिए प्रयोग किये हैं । पुनश्च जीन से प्रारम्भ कर कोशिका, तन्त्र आदि के माध्यम से आधुनिक जीव-विज्ञान सन्दर्भित मनुष्य के निर्माण विषयक तथ्य पर दृष्टि दी गई है । सूक्ष्म जीव-विज्ञान के जनक लुईस पाश्चर का मत तथा सेल्ड्रेक का सिद्धान्त (Theory of Morphogenetic fields) इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं ।

इसी प्रकार से आधुनिक विज्ञान ने जीवन तथा जगत् के सृजनात्मक तथ्यों को उपस्थापित किया है । विज्ञान प्रतिपादित डार्विन सिद्धान्त तथा बिगबैंग सिद्धान्त पर अनेक वैज्ञानिकों ने न्यूनता दर्शाई है, जबकि सापेक्षता का सिद्धान्त (Theory of Relativity), क्वाण्टम सिद्धान्त (Quantum Theory) एवं तापगतिकी सिद्धान्त (Theory of Thermo-dynamics)- तीनों चरम तथा त्रुटिहीन सिद्धान्त के रूप में अधुना सर्वसम्मत हैं । अतः डार्विन सिद्धान्त (Darwin Theory) व बिगबैंग सिद्धान्त (Bigbang Theory) का विश्लेषण करना उपयोगी सिद्ध होगा ।

एवंतया दर्शन और आधुनिक विज्ञान, दोनों का सम्मिश्रित-रूप ही वास्तविक सत्य एवं तथ्य को उन्मोचित करने में समर्थ होगा । दर्शन का मुख्य उद्देश्य ही है सुनिश्चित प्रमाणों का अवलम्बन कर उक्त विषय का दिग्दर्शन कराना । अध्यात्म एक ऐसी दिशा है जो सिद्धान्तों वा मूल्यों इत्यादि के बारे में पक्षरहित तथा द्वेषरहित दृष्टि से और युक्ति तथा विवेक-सम्मत रीति से प्रकाश डालती है । अतः विज्ञान, दर्शन व अध्यात्म- दिशात्रय से विषय-वस्तु का अन्वेषण व परीक्षण करना ही सर्वोत्तम विधि सिद्ध होगी । एतत्सहित व्यावहारिक ज्ञान को भी समाविष्ट करना उपयोगी होगा क्योंकि इसकी अनिवार्यता सर्वस्वीकृत है तथा इससे प्रतिकूल विषय की यथार्थता भ्रान्ति की परिचायिका होती है ।

इसी दिशा में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, एक विश्वव्यापी आध्यात्मिक शिक्षण संस्थान, दर्शन-क्षेत्रावलम्बित तत्त्व-मीमांसीय चिन्तन-प्रणाली में एक विशेष व अभिनव पथ का दिग्दर्शन कराता है जिसमें सृष्टि-संरचना या सृष्टि-तत्त्व को विज्ञान-सम्मत, तर्कसंगत तथा युक्तिपूर्ण रीति से विवेचन करने का प्रयास किया गया है । मान्यतानुसार निराकार परमपिता परमात्मा शिव ने ‘प्रजापिता ब्रह्मा’ के साकार माध्यम से जो ईश्वरीय महावाक्य या ज्ञान को प्रकट किया है, वही ब्रह्माकुमारी दर्शन का मूल स्रोत है । इस आध्यात्मिक शिक्षा संस्थान के मुख्य प्रवक्ता ब्रह्माकुमार जगदीश चन्द्र हसीजा ने उक्त ईश्वरीय ज्ञान के आधार से प्रसंगानुकूल विषय-वस्तु की सत्यता को वैज्ञानिक तथा दार्शनिक दृष्टिकोण से अनुशीलन कर एक सारभूत तथ्य को सर्वसमक्ष दृढ़ता के साथ प्रतिपादित या प्रतिष्ठापित करने का उद्यम किया है । ब्रह्माकुमारी दर्शन के अनुसार अचेतन वस्तु जगत् या भौतिक विश्व अजात तथा शाश्वत तत्त्वों का रूपान्तरण या प्रभाव है । द्रव्य के तत्त्व और तत्सहित उनके प्रभाव अविवेकी व उत्पादक हैं किन्तु स्वयं द्रव्य उत्पाद नहीं है क्योंकि वह शाश्वत है । द्रव्यरूप जगत् निरन्तर परिवर्तनशील होने के कारण अल्पकालिक है । परन्तु संपूर्ण जगत् आदि-द्रव्य या द्रव्य की पारमाणवीय अवस्था में कभी भी रूपान्तरित नहीं होता तथा न ही यह विश्व कभी मानव-प्राणियों से विहीन होता है । यह जगत् एक ब्रह्माण्डीय नाटक-रूप है जिसमें संघटित होने वाली प्रत्येक घटना का पुनरावर्तन हर 5000 वर्ष के उपरान्त चक्रीय गति से होता है । क्योंकि विश्व की घटनायें ऐसी हैं कि एक घटना दूसरी घटना का कारण और दूसरी घटना किसी अन्य घटना का कारण है एवं इस प्रकार कार्य-कारण की शृंखला अन्तहीन हो जाती है । अतः चक्र-रूप संघटित होने से विश्व-प्रक्रिया की शाश्वतता निश्चित होती है ।

विश्व एक स्व-पोषक, स्व-शाश्वतकारी (Self-perpetuating) तथा स्व-पुनरावर्ती चक्रीय तन्त्र है । यह जगत् एक उत्पाद नहीं है, अपितु इसमें पृथक् पृथक् निर्माताओं द्वारा निर्मित उत्पाद अन्तर्विष्ट हैं । संसार ऐसे उत्पादों का समूह है जिनके प्रकृति की शक्तियों के रूप में अपने-अपने निर्माता से और प्रत्येक संघटक की अन्तर्निहित प्रकृति अन्य प्रकृति से अन्तःक्रिया करती है । प्रकृति की वस्तुओं में एक प्रणाली है जो निश्चित वैश्विक नियमों के कारण है एवं उनसे वस्तुओं के कार्य विनियमित होते हैं । प्रकृति के ये नियम अनिर्मित हैं और सर्वदा विद्यमान हैं एवं रहेंगे । उदाहरणस्वरूप- बीज एक अन्तर्निहित आनुवंशिक कूट और विभव के अनुसार पौधा या पादप के रूप में विकसित होता है । इसके लिये किसी भी बाहरी सचेतन कर्ता या नियामक नियति की आवश्यकता नहीं होती जो उसका निर्माण करे । प्रकृति के कतिपय नियम उसकी वृद्धि की व्याख्या करते हैं, अन्यथा रचयिता कोई नहीं है । इसी प्रकार भौतिक जगत् का निर्माण किसी भी सचेतन कर्ता या ईश्वर के द्वारा नहीं हुआ है । किन्तु जब उभय आध्यात्मिक व भौतिक ऊर्जा में गिरावट आने से अधिकतम एन्ट्रॉपी की अवस्था पहुँच जाती है तब आध्यात्मिक ऊर्जा के उच्चतम बिन्दु स्रोत परमात्मा इस भौतिक जगत् में हस्तक्षेप करता है एवं ईश्वरीय ज्ञान तथा राजयोग के माध्यम से आध्यात्मिक एन्ट्रॉपी को उत्क्रमित कर देता है और अन्यपक्षतः परमाणु अस्त्रशस्त्र के विखण्डन, प्राकृतिक आपदाओं आदि द्वारा भौतिक एन्ट्रॉपी उत्क्रमित हो जाती है । जिससे एक पूर्ण व्यवस्थित व सन्तुलित जगत् की स्थापना होती है । मनुष्यात्माओं के नैतिक पुनरुत्थान या आध्यात्मिक नवीनीकरण द्वारा ही भौतिक विश्व में परिवर्तन होने से प्रकृति में पुनः ऊर्जा आती है एवं सृष्टिचक्र पुनः प्रारम्भ होता है । स्थूल जगत् शाश्वत है, ईश्वर केवल इसका रूपान्तरण या जीर्णोद्धार करता है जिसके कारण उसको ‘नूतन जगत्-निर्माता’ या ‘विश्व-रचयिता’ या ‘सृष्टिकर्ता’ के नाम से अभिहित किया जाता है । यह भौतिक जगत् आकाश नामक तत्त्व में अवस्थित है । किन्तु इस इस विश्व से भी ऊर्ध्व सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं का एक सूक्ष्म जगत् ‘अव्यक्त धाम’ एवं उसके पार निराकारी आत्माओं व ईश्वर का जगत् ‘ब्रह्म धाम’ नाम से सूक्ष्म विश्वद्वय हैं जो कि स्वयंप्रकाशी अचेतन महत्तत्त्व या ब्रह्म नामक तत्त्व में अवस्थित हैं । यह भौतिक विश्व यद्यपि आकार में विशाल किन्तु सीमित है द्रव्यमानरहित, गतिहीन, अनन्त ‘दिव्य द्रव्य’ ब्रह्म तत्त्व (ब्रह्माण्ड) रूपी परिवलयक द्वारा परिवेष्टित है । ब्रह्म जगत् से ही आत्मायें एवं परमात्मा इस स्थूल जगत् में अवतरण कर अपनी अविनाशी भूमिका लीला के रूप में प्रस्तुत कर पुनः कल्प के अन्त में स्वधाम की ओर प्रत्यावर्तन करते हैं । चतुःआयामीय अवकाश-काल सातत्यक रूपी इस भौतिक जगत् का पाँचवा नैतिक आयाम भी है जो जीवों की क्रिया की केवल प्रतिक्रिया के रूप में संघटित नहीं होती, अपितु उसके परिणामरूप कर्ता को मुख्यतः दुःख या सुख-दुःख का मिश्रण प्राप्त होता है ।

पुनश्च जगत् के स्वरूप के सन्दर्भ में दार्शनिक व वैज्ञानिक मतावलम्बित द्रष्टा और दृश्य या विषयी और विषय के मध्य सम्बन्ध का महत्त्वपूर्ण तथ्य भी विवेचनीय है । प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने सापेक्षता सिद्धान्त एवं एकीकृत क्षेत्र सिद्धान्त (Unified Field Theory) के माध्यम से प्रतिपादित करने का प्रयत्न किया है कि - द्रव्य एवं ऊर्जा परस्पर परिवर्तनीय हैं तथा भौतिक ऊर्जा के सभी रूप मूलतः एक ही हैं अर्थात् प्रकृति की समस्त शक्तियाँ (विद्युत्-चुम्बकीय, मेसॉन, गुरुत्वाकर्षण बल इत्यादि) वास्तवतः एक ही मूल शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं । इस प्रकार विज्ञान-प्रतिपादित क्वाण्टम सिद्धान्त एवं एकीकृत क्षेत्र सिद्धान्त क्रमशः व्यष्ट्यात्मक व समष्ट्यात्मक जगत् के स्वरूप की ओर इंगित करते हैं । आधुनिक भौतिकी की दो शाखाएँ क्वर्क्स (Quarks) एवं होलन (Holons), एतद्विषयक व्यष्टिक तथा समग्रता की अवधारणा प्रस्तुत करती हैं । दार्शनिक चिन्तन-पद्धति में भी इसी समष्टि-व्यष्टि रूपात्मक जगत्-सम्बन्धी दृष्टिकोण के अनेक निदर्शन प्राप्त होते हैं जिससे विज्ञान एवं दर्शन के मध्य ऐक्य अथवा समन्वयता का चित्र प्रतिबिम्बित होता है । किन्तु उक्त उभयात्मक विधि की यथार्थता विचारणीय है ।
वर्तमान समय में आधुनिक विज्ञान अपनी चरम सीमा को प्राप्त करने में प्रयासरत है, क्योंकि अनेक प्रतिष्ठित भौतिकी-विज्ञानी, खगोलशास्त्री इस कार्य में संनिबद्ध हैं । अन्यतः, मुख्यतः भारतीय दर्शन में उस परम-कारण या परम-सत्ता या परम-शक्ति के विषय में अनेकशः उल्लेख दर्शन के ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं । अतः यही समुचित समय है जहाँ उभय दर्शन एवं आधुनिक विज्ञान के मध्य समानान्तरता का निरूपण कर संबंध स्थापित किया जा सकता है । इसी दृष्टि को ध्यान में रख कर अनेक दार्शनिक तथा खगोल-भौतिक-विज्ञानी इन दोनों क्षेत्र में सामञ्जस्य का वर्णन अपने-अपने लेखन में करते हैं । निम्नोक्त कतिपय दृष्टान्त द्रष्टव्य हैं-

ख्यातनामा भौतिकीविद् फ़्रिट्जॉफ़ काप्रा (Fritjof Capra) अपनी पुस्तक ‘The Tao of Physics’ में उल्लेख करते हैं कि परम-सत्ता शिव का नृत्य ही नर्तनशील जगत् है । ऊर्जा का अनवरोधित प्रवाह जो अनन्त रूप में गतिशील है, एक-दूसरे में परस्पर अन्तर्वेशित हो रहा है । शिव का नर्तन ही उप-पारमाणविक द्रव्य का नर्तन है । यह सर्जना और विनाश का निरन्तर नृत्य है जिसमें सम्पूर्ण जगत् समाविष्ट है ।
पुनश्च अन्तःशीर्षक में नाम संयोजित कर समान्तरता को अभिसूचित करते हुए लिखते हैं-
"An Exploration of the parallels between Modern Physics and Eastern Mysticism"

अद्वैत-वेदान्ती दार्शनिक स्वामी विवेकानन्द दर्शन और विज्ञान में समानान्तरता का कथन करते हुए कहते हैं - मन (Mind) और द्रव्य (Matter), दोनों में केवल आभासिक भेद है, वस्तुतः सत्ता एक ही है ।

सत्ता (Being) और द्रव्य (Matter) में कोई द्वन्द्व नहीं है, दोनों एक ही हैं । जैसे परमाणु अदृश्य, अचिन्त्य है; किन्तु उसमें समग्र संसार की मूलशक्ति तथा क्षमता अन्तर्निहित है, वैसा ही वेदान्ती ‘आत्मा’ के विषय में अभिधान करते हैं ।

पुनश्च समग्र विश्व में एकसत्तात्मकता का वर्णन कर सांख्यदर्शन की प्रकृति (Nature) को ही ईश्वर (God) के रूप में स्वीकार करते हैं ।

विशिष्ट पदार्थ-विज्ञानी फ़्रिट्जॉफ़ काप्रा के वैज्ञानिक अभिमतों का एवं अद्वैतवेदान्ती स्वामी विवेकानन्द के दार्शनिक अभिमतों का समीक्षण करते हुए ब्रह्माकुमार जगदीश चन्द्र स्वकीय मन्तव्य प्रस्तुत करते हैं ।

इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से विज्ञान व दर्शन द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों का पुनरीक्षण कर तत्त्वमीमांसीय क्षेत्र का विश्लेषण तथा मूल्याङ्कन करना सर्वथा उपयोगी सिद्ध होगा; क्योंकि विज्ञान व दर्शन की अपेक्षा अध्यात्म सूक्ष्म, उच्चतर अनुभवसिद्ध स्तर है जिसको त्याग कर विज्ञान एवं दर्शन के सिद्धान्तों पर दृष्टि देना एकाङ्गी होगा । अतः अध्यात्म-दर्शन-विज्ञान तीनों उच्च कोटि के आयामों का समावेश कर उपर्युक्त तथ्यों पर विमर्श करने से सृष्टि-संबंधित रहस्यात्मक अन्वेषण को एक सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकेगा एवं एक निश्चित निष्कर्ष की भी प्राप्ति हो सकेगी ।

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सन्दर्भग्रन्थसूची :

1. प्रकृति, पुरुष तथा परमात्मा का अविनाशी नाटक, भाग-1, ब्रह्माकुमार जगदीश चन्द्र हसीजा, प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, आबू पर्वत, राजस्थान, 2003, तृतीय संस्करण

2. अविनाशी विश्व-नाटक, भाग-2, ब्रह्माकुमार जगदीश चन्द्र हसीजा, प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, आबू पर्वत, राजस्थान

3. श्लोकवार्त्तिक, कुमारिल भट्ट, पार्थसारथिमिश्र की ‘न्यायरत्नाकर’ व्याख्या सहित, संपा. रामशास्त्री तैलङ्ग, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी

4. मध्यमकशास्त्रम्, नागार्जुन, चन्द्रकीर्त्ति की प्रसन्नपदा व्याख्या संवलित, संपा. श्रीधर त्रिपाठी, संस्कृत विद्यापीठ, मिथिला, बौद्ध संस्कृत ग्रन्थावली, संख्या 10, दरभंगा, 1987, द्वितीय संस्करण

5. ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य-रत्नप्रभा, भाषानुवाद सहित, प्रथम भाग, भोलेबाबा, भारतीय विद्या प्रकाशन, दिल्ली, 2004

6. सांख्य-तत्त्व-कौमुदी, वाचस्पति मिश्र, हिन्दी अनुवाद, आद्याप्रसाद मिश्र, इलाहाबाद

7. व्योमवती, व्योमशिवाचार्य, संपा. गोपीनाथ कविराज, ढुण्ढिराज शास्त्री, चौखम्बा संस्कृत सीरीज, ग्रन्थ संख्या. 61, 1930

8. जैनसिद्धान्तदीपिका, आचार्य तुलसी, आदर्श संघ, चुरू, राजस्थान, 1970, द्वितीय संस्करण

9. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी, भाग 1-2 (कारिका-टीका), अभिनवगुप्त, काश्मीर ग्रन्थावली, श्रीनगर, 1921

10. सर्वदर्शनसंग्रह, माधवाचार्य, संपा. उमाशंकर शर्मा ‘ऋषि’, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, 1964

11. श्रीमद्भगवद्गीता, शांकरभाष्यसहित, गीता प्रेस, गोरखपुर, 2000

12. श्रीमद्भागवतपुराणम्, श्रीधरस्वामीकृत भावार्थबोधिनी टीकासहित, संपा. जगदीश लाल शास्त्री, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, 1983, प्रथम संस्करण

13. भारतीय दर्शन : आलोचना और अनुशीलन, चन्द्रधर शर्मा, मोतीलाल बनरसीदास, दिल्ली, 2004, पुनर्मुद्रण
14. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, शारदा मन्दिर, वाराणसी, 2001, पुनर्मुद्रण

15. The Tao of Physics : An Exploration of the Parallels Between Modern Physics and Eastern Mysticism, Fritjof Capra, Shambhala publications, Berkeley, California, 1975.

16. Science and Spirituality, B.K. Jagdish Chander, Brahmakumaris World Spiritual University, Pandav Bhawan, Mount Abu, 1988.

17. Parallels between Science and Religion and Philosophy and Science- A Critical Review, B.K. Jagdish Chander, Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidyalaya, Pandav Bhawan, Mount Abu, Rajasthan, 1994, 1st edition.

18. The complete Works of Swami Vivekananda, Advaita Ashram, Calcutta, 1977.

19. The New Vedic Selection, Braj Bihari Chaubey, Bharatiya Vidya Prakashan, Varanasi, 1972.

20. Upanişad Series : Śvetāśvataropanişad, Swami Tyagisananda, Sri Ramakrishna Math, Mylapore, Madras, 7th edition.

21. The New Encyclopaedia Britannica, Vol-10, Encyclopaedia Britannica Inc., Chicago, 1993, Rpt.

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